दैनिक चिंगारी के प्रकाशन का 33वां वर्ष, अगले पड़ाव की ओर…

आज के दौर में जब पत्रकारिता पूर्णत: व्यवसाय बनती जा रही है और कदाचित राजनीतिक हितों को साधने तथा ग़ैरक़ानूनी कृत्यों पर पर्दा डालने का ज़रिया भी, तब श्रद्धेय बाबूसिंह चौहान के सिद्धांतों पर आधारित मिशनरी पत्रकारिता की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। हम जानते हैं कि चौहान साहब के बताये मार्ग पर चलना बहुत कठिन है, क्योंकि इसमें कांटे ज्यादा और मुस्कानें बहुत कम हैं, फिर भी हम यह वचन दोहराते हैं कि चिंगारी सदैव इसी मार्ग पर चलता रहेगा।
अधिकतर पाठकों को शायद यह ज्ञात नहीं होगा कि उन तक ‘चिंगारीÓ को पहुंचाने में रोज़ कितना श्रम लगता है और सीमित साधनों व असीमित झंझावातों के बीच हमें कितनी पथरीली राहों से गुजऱना पड़ता है। दरअसल, जिन परिस्थितियों में हम अख़बार चला रहे हैं, वो आंधियों के बीच दीया जलाने जैसा है, और इस दीये को जलाये रखने में कई बार हमारे हाथ जले भी, पर हमने आर्थिक लाभ के लिए अपने हाथों को मैला नहीं होने दिया। चादर कम पड़ी तो पैर सिकोड़ लिये, पर महत्कांक्षाओं के पीछे नहीं दौड़े। अपने सपनों को पूरा करने के लिए चौहान साहब के सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
इन बातों को लिखने का आशय सहानुभूति अर्जित करना अथवा आत्मप्रशंसा करना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि चिंगारी को अपने पाठकों केविश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के लिए प्रतिदिन संघर्षों की भट्टी में तपना पड़ता है। हालांकि ऐसा करके हम कोई अहसान या महान काम नहीं कर रहे, क्योंकि हमने यह कंटक-पथ स्वयं चुना है, किसी ने हमें विवश नहीं किया। इस पथ पर चलते हुए कांटों की चुभन अब हमें पीड़ा नहीं देती, बल्कि हमारे ज़ख़्मों को सहलाती है।
25 अक्टूबर 1985 की वो शाम, जब बिजनौर के महावीर स्कूल में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने चिंगारी सांध्य दैनिक का विमोचन किया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि बिजनौर जैसे सुविधाविहीन नगर से कोई सांध्य दैनिक चल पड़ेगा। पर बाबूजी की संकल्पशक्ति और बड़े भाई चंद्रमणि रघुवंशी की प्रखर लेखनी ने चिंगारी को ऐसे पंख लगाये कि देखते ही देखते चिंगारी की लोकप्रियता शिखर पर जा पहुंची। आम जनता का यह पत्र लोगों के दिलों की धड़कन बन गया। आज हम गर्व कर सकते हैं कि चिंगारी देश के प्रमुख सांध्य दैनिकों में से है।
जब आप सिद्धांतों की विरासत को संभालते हैं, तब सुविधाओं की अपेक्षा नहीं कर सकते। चिंगारी भी कभी सुविधाओं का मोहताज नहीं रहा, लेकिन हमारे पास आदर्शों की पूंजी है और नैतिक मूल्यों का संबल भी। चिंगारी को अपने पाठकों से जो लाड-प्यार मिला है, वो अद्वितीय है, किंतु आपका यह पत्र छोटी सोच वाले कुछ लोगों की आंखों में हमेशा खटकता रहा है, यहां तक कि बड़ी-बड़ी संस्थाएं और ऊंचे पदों पर बैठे व्यक्ति भी हमारे पथ में अवरोध खड़े करते रहे हैं, मगर चिंगारी ऐसे अवरोधों की परवाह नहीं करता।
आम लोगों की आवाज़ को पूरी शिद्दत से उठाना चिंगारी का जुनून है और हर ख़ास-ओ-आम तक सच्ची व सटीक सूचनाएं पहुंचाना चिंगारी का धर्म है। पीडि़तों की आंख के आंसू पोंछना और मज़लूमों को इंसाफ़ दिलाने की कोशिश करना चिंगारी अपना फज़ऱ् समझता है। प्रतिदिन शाम को जब चिंगारी पढ़कर थके-हारे लोगों के अधरों पर मुस्कान आती है, तब हमें लगता है हमारी दुआ कुबूल हुई तथा हमारा मक़सद पूरा हुआ। इस आनंद को चिंगारी परिवार हर दिन, हर शाम महसूस करता है और यही हमारी उपासना है, यही हमारी थाती है।
आज से हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं। 32 वर्षों की यह यात्रा बड़ी अद्भुत रही। संघर्षों के बीच चिंगारी ने कई अभिनव प्रयोग भी किये, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुए। चिंगारी ने जब तुकांत शीर्षक लगाने शुरू किये, तब पत्रकारिता के कुछ स्वनामधन्य पुरोधाओं ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। हमारी भाषा पर उंगलियां उठाई गई थीं, स्तरहीनता के आरोप भी लगे थे, मगर आज उन्हीं में से कई महानुभाव, उनके अख़बार तथा न्यूज़ चैनल तुकबंदी के सहारे अपनी पहचान बना रहे हैं और उस पर गर्व कर रहे हैं। हमने पत्रकारिता में आंचलिक शब्दों का प्रयोग शुरू किया, तब भी भाषा के ठेकेदारों ने नुक्ताचीनी की थी, मगर हमने ‘बिजनौरीयतÓ को नहीं छोड़ा और अपनी मिट्टी की सौंधी गंध को चंदन समझकर मस्तक से लगाया।
दैनिक प्रकाशन के 33वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर चिंगारी अपना यह संकल्प दोहराता है कि आपका यह पत्र आम आदमी की आवाज़ को शासन-प्रशासन के कानों तक पहुंचाने तथा शोषणमुक्त परिवेश को रचने के लिए अलख जगाने का काम करता रहेगा। साथ ही चिंगारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्षरत रहेगा तथा निष्पक्षता, सत्यता व निर्भीकता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। आपसी प्यार, भाईचारे व साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए चिंगारी कोई भी कुर्बानी देने को तैयार रहेगा। इसी संकल्प के साथ सभी पाठकों, विज्ञापनदाताओं, एजेंटों, हॉकरों का हार्दिक अभिनदंन।

                                                                  —- सूर्यमणि रघुवंशी

 

चिंगारी
साप्ताहिक
26 जनवरी 1950
सांध्य दैनिक
25 अक्टूबर 1985
संस्थापक
बाबूसिंह चौहान

 

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